आई पी सी सेक्शन 100, किन परिस्थितियों में मानव हत्या अपराध नहीं होगी ?

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हत्या कब और कैसे अपराध नहीं होगी ? देखें IPC 100

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आपने मधुमखी के बारे में तो सुना होगा ?
मधुमखी पर जब भी संकट आता है, तो आप जानते है वो उग्र रूप से अपनी जान और अपने छते की सुरक्षा के लिए हमला बोल देती है। मधुमखी ही नहीं, नवजात शिशु भी किसी संकट के आभास में जोर-जोर से चिल्लाने लगता है, जल, थल में रहने वाले जीव और यहाँ तक की हवा में उड़ने वाले पक्षी भी संकट के समय में आत्मरक्षा के लिए हमलावर बन जाते है। इससे यह पता चलता है कि हर जीव में अपनी आत्मरक्षा की प्रवृति, प्राकृतिक रूप से उसके जन्म से ही पाई जाती है।

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, और सामाजिक प्रणाली में नियमों और कानूनों का विशेष महत्व होता है, इसलिए विश्व के लगभग हर देश में कानून व्यवस्था है, और उनकी कानून व्यवस्था में आत्मरक्षा के कानून का प्रावधान है।

भारत में आपराधिक कानूनों को भारतीय दंड संहिता (Indian Penal Code या IPC) के अंतर्गत परिभाषित किया गया है। IPC की धारा 96 से लेकर IPC 106 तक निजी प्रतिरक्षा के अधिकारों ( Right of Private Defense ) की व्याख्या की गई है।

इन विभिन्न धाराओं में उन सभी परिस्थितियों का वर्णन किया गया है जिनके अंतर्गत व्यक्ति की निजी सुरक्षा के अधिकार को प्रयोग में लाया जा सकता है और वहीँ IPC की धारा 99 के द्वारा उन स्थितियों और परिस्थितियों को भी बताया गया है जिनके अंतर्गत निजी प्रतिरक्षा (private defence) का अधिकार आम नागरिक को नहीं मिलता। IPC की धारा 100 में विस्तार पूर्वक बताया गया है कि कब-कब शरीर की प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार मृत्यु का कारण बन सकता है।

प्राइवेट या निजी प्रतिरक्षा क्या है, आइये इसे समझते है : भारत का प्रत्येक नागरिक जिस राज्य में रहता है, वो वहां का एक सदस्य माना जाता है, मतलब हर नागरिक की सुरक्षा का दायित्व वहां की सरकार का होता है, सरकार द्वारा कानून व्यवस्था को पुलिस व्यवस्था द्वारा सुनिश्चित किया जाता है।

पुलिस अपराध रोकने का एक वैधानिक साधन है, जो हमारे आस-पास ही उपस्थित रहती है, परन्तु क्या यह संभव है कि पुलिस द्वारा, प्रत्येक व्यक्ति को, हर समय, किसी भी उग्र परिस्थिति में तुरंत सुरक्षा उपलब्ध करवाई जा सके ?

विश्व में कोई भी सरकार अपने किसी भी नागरिक को फुलप्रूफ सुरक्षा नहीं दे सकती इसलिए कानून में अपनी निजी सुरक्षा का प्रवधान दिया जाता है, और इसीलिए, भारतीय दंड संहिता की धारा 100 में हर नागरिक को अपने शरीर की निजी तौर पर, उसके शरीर पर हुए घातक हमले या हमले की आशंका होने पर अपने शरीर की रक्षा करने के अधिकार को उस समय उत्पन्न परिस्थितियों के आधार पर परिभाषित किया गया है, जिसमे अपनी जान पर खतरा देखते हुए कोई भी व्यक्ति आवश्यकता पड़ने पर इस अधिकार का प्रयोग कर आक्रमणकारी का वध तक भी कर सकता है, यह बात अलग है कि इस बात को उसको न्यायालय में सिद्ध करना पड़ेगा।

भारतीय दण्ड संहिता की धारा 100 क्या कहती है :
यदि, किसी व्यक्ति पर कोई ऐसा हमला होने आशंका होती है जिसके कारण उसे लगता है कि उस पर होने वाले हमले का परिणाम उसकी मृत्यु हो सकती है या उस हमले के कारण उसके अंगभंग हो सकते है या गहरा घाव हो सकता है तो उस अवस्था में वो अपनी आत्मरक्षा में, हमला करने वाले का वध करता है या उसे शारीरिक हानि पहुंचता है तो ,

यदि, किसी महिला पर बलात्कार का प्रयास होने पर उस महिला द्वारा प्रतिरोध में उठाये गए कदम द्वारा बलात्कारी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है या शारीरिक हानि होती है तो,

यदि, किसी व्यक्ति पर अप्राकृतिक योन-क्रिया का प्रयास होने पर उस व्यक्ति के प्रतिरोध से यौनाचारी का वध या शारीरिक हानि होने पर,

यदि, किसी व्यक्ति का अपहरण करने का प्रयास होता है और उस अपहरण को विफल करने के प्रयास में अपहृति होने वाले वयक्ति द्वारा अपनी आत्मरक्षा के लिए अपहरणकर्ता की मृत्यु होने पर या शारीरिक हानि होने पर,

किसी व्यक्ति पर कोई जानलेवा हमला होता है और जिसपर हमला हुआ है उसे यह शंका है की कोई अधिकारी उसकी मदद में नहीं आ सकता है तो उस स्थिति में उठाये गए आत्मरक्षा के कदम से यदि हमलावर की हत्या हो जाती है तो,

यदि कोई किसी को तेजाब पिलाने या उस पर फेंकने का प्रयास करता है और इस हमले से, जिस पर हमला होनेवाला है उसे यह आशंका हो जाती है और इस स्थिति में वो कोई अपनी रक्षा के कदम उठता है जिससे हमलावर की मृत्यु हो जाती है तो और ऊपर बताये गए सभी कारणों के परिणाम स्वरूप यदि हमलावर की मृत्यु होती है तो वो इस धारा की अंतर्गत आएगी।

देर है पर अंधेर नहीं : यह एक सच्ची घटना है।
घटना 05.06.1988 की है, जब तमिलनाडु राज्य के धर्मपुरी वन क्षेत्र में जंगल के रेंज अधिकारी श्री सुकुमारन अपने ड्राइवर के साथ लगभग 6.30 बजे अपनी ड्यूटी के अनुसार अपनी जीप पर गश्त कर रहे थे। जंगल में कुछ तस्कर, चन्दन के लकड़ी की तस्करी करते हुए पकडे गए। फारेस्ट रेंजर श्री सुकुमारन ने उन्हें ललकारा, उसपर उन्होंने ने पथराव चालू कर दिया, अपनी आत्मरक्षा के लिए श्री सुकुमारन ने गोली चला दी जिसके परिणाम स्वरूप तस्कर बाशा सपुत्र अमीर मारा गया।

अब शुरू होती है न्याय प्रक्रिया : 1988 में सुकुमारन पर ipc की धारा 302 और धारा 203 का मुकदमा लगा दिया गया जबकि सुकुमारन ने गोली अपनी आत्मरक्षा में चलाई थी।

अब करते है मुद्दे की बात : सन 1988 में यह घटना हुई थी, और फारेस्ट रेंजर को दोषी करार दे दिया गया था, 07 मार्च 2019 को माननीय सुप्रीम कोर्ट ने दोषी को दोष मुक्त कर दिया। सं 1988 से 2019 लगभग 31 वर्ष लगे आत्म-रक्षा का न्याय पाने में।

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