1400 साल पुराना तलाक-ए-बिद्दत (Triple Talaq) रद्द हुआ - Judgement

शायरा बानो (Shayara Bano), मुस्लिम विमेंस क्वेस्ट फॉर इक्वलिटी (Muslim Women’s Quest For Equality), आफरीन रेहमान (Aafreen Rehman), गुलशन परवीन (Gulshan Parveen), इशरत जहां (Ishrat Jahan) और अतिया साबरी (Atiya Sabri) द्वारा दायर याचिका की सुनवाई के बाद पाँच जजों की एक संविधान पीठ ने 3:2 के बहुमत से एक ऐतिहासिक निर्णय द्वारा 22 अगस्त 2017 को मुस्लिम समाज में 1400 वर्षो से प्रचलित तलाक-ए-बिद्दत (Talaq e Biddat) या ट्रिपल तलाक (Triple Talaq) को रद्द कर दिया। जबकि इससे पहले सन 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने स्वत: ही मुस्लिम समुदाय में प्रचलित तीन तलाक, बहुविवाह और निकाह हलाला आदि का संज्ञान लेते हुए मामले को जनहित याचिका में परिवर्तित कर दिया था।
सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि तीन तलाक स्पष्ट रूप से मनमाना है, क्योंकि यह मुस्लिम पुरुष को वैवाहिक संबंध को बचाने का प्रयास किए बिना संबंध विछेद की अनुमति देता है। लिहाजा संविधान के अनुच्छेद-25 यानी धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के अनुसार इस प्रथा को संरक्षण नहीं दिया जा सकता और यह मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।
गौरतलब है कि पांच जजों के संविधान पीठ के सदस्य अलग-अलग धर्म के हैं। चीफ जस्टिस जे एस खेहर और जस्टिस एस अब्दुल नजीर ने यह कहते हुएँ कि 1400 वर्षों से चली आ रही प्रथा अब धर्म का हिस्सा बन गई है इसलिए ट्रिपल तलाक अनुच्छेद-25 का अहम हिस्सा है, वहीं जस्टिस रोहिंग्टन एफ नरीमन, जस्टिस कूरियन जोसफ और जस्टिस यूयू ललित ने जहां तीन तलाक को असंवैधानिक करार दिया है।
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