जमानती अपराधों में जमानत का पूरा अधिकार।

जमानती धाराओं में गिरफ्तार व्यक्ति अगर जमानत की शर्तो को पूरा करता है तो उसे जमानत पर रिहा किया जा सकता है। सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति आर.वी. रवींद्रन और न्यायमूर्ति जे.एम. पांचाल की खंडपीठ ने सन 2009 में श्री रसिक लाल द्वारा दायर एक अपील की सुनवाई के बाद अपने निर्णय में कहा कि जमानती धाराओं में गिरफ्तार व्यक्ति को ऐसे मामले में जमानत देने या न देने में अदालत या पुलिस अधिकारी की राय का कोई महत्व नहीं है और पुलिस अधिकारी या अदालत द्वारा तय की गई जमानत की शर्तो को पूरा करने या बांड भरने के बाद उसे जमनात दी जानी चाहिए। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के एक आदेश को रद करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्णय दिया। जबकि, मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने मानहानि के मामले में आरोपी को निचली अदालत से मिली जमानत को निरस्त कर दिया था।

सर्वोच्च न्यायालय ने दण्ड प्रक्रिया संहिंता की धारा 436 का उल्लेख करते हुए स्पष्ट किया कि जमानती धाराओं में आरोपी को जमानत का पूरा अधिकार है यदि, आरोपी जमानत की शर्तो को पूरा करता है तो उसे जमानत पर रिहा करना ही होगा। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि ऐसे मामले में आरोपी को तभी हिरासत में रखा जा सकता है जब वह जमानत देने में अक्षम हो।

सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय का यह अर्थ है कि दण्ड प्रक्रिया संहिता की प्रथम अनुसूची में सभी जमानतीय अपराधों कि धाराओं के अंतर्गत दर्ज मामलों के आरोपियों को तय की गई जमानत की शर्तो को पूरा करने या बांड भरने के बाद तुरंत जमानत मिल जानी चाहिए। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर आरोपी जमानत की शर्तो को पूरा करने में धोखाधड़ी करता है या रिहाई के बाद उसका व्यवहार निष्पक्ष सुनवाई को प्रभावित करता है तो हाई कोर्ट जमानत को निरस्त कर सकता है।

सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले को निचे पढ़ें:



बलात्कार एक घृणित अपराध
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