CrPC 436 in Hindi - दण्ड प्रक्रिया संहिता धारा 436

अध्याय 33 - दण्ड प्रक्रिया संहिता धारा 436 - किन मामलों में जमानत ली जाएगी।

1. जब अजमानतीय अपराध के अभियुक्त व्यक्ति से भिन्न कोई ब्यक्ति पुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी द्वारा वारंट के बिना गिरफ्तार या निरुद्ध किया जाता है या न्यायालय के समक्ष हाजिर होता है या लाया जाता है और जब वह ऐसे अधिकारी की अभिरक्षा में है उस बीच किसी समय, या ऐसे न्यायालय के समक्ष कार्यवाहियों के किसी प्रक्रम में, जमानत देने के लिए तैयार है तब ऐसा व्यक्ति जमानत पर छोड़ दिया जाएगा:

परन्तु यदि ऐसा अधिकारी या न्यायालय ठीक समझता है 2[तो वह ऐसे व्यक्ति से जमानत लेने के बजाय उसे इसमें इसके पश्चात उपबंधित प्रकार से अपने हाजिर होने के लिए प्रतिभूओं रहित बंधपत्र निष्पादित करने पर उन्मोचित कर सकेगा और यदि ऐसा व्यक्ति निर्धन है और जमानत देने में असमर्थ है, तो उसे ऐसे उन्मोचित करेगा।]
3[स्पष्टीकरण --- जहां कोई व्यक्ति अपनी गिरफ्तारी की तारीख के एक सप्ताह के भीतर जमानत देने में असमर्थ है वहां अधिकारी या न्यायालय के लिए यह उपधारणा करने का पर्याप्त आधार होगा कि वह इस परन्तुक के प्रयोजनों के लिए निर्धन व्यक्ति है। ]:

परन्तु यह और कि इस धारा की कोई बात धारा 116 की उपधारा 3 4[या धारा 446क ] के उपबंधों पर प्रभाव डालने वाली न समझी जाएगी।

2. उपधारा 1 में किसी बात के होते हुए भी, जहां कोई व्यक्ति, हाजिरी के समय और स्थान के बारे में जमानत पत्र की शर्तों का अनुपालन करने में असफल रहता है वहां न्यायालय उसे, जब वह उसी मामले में किसी पश्चात्वर्ती अवसर पर न्यायालय के समक्ष हाजिर होता है या अभिरक्षा में लाया जाता है, जमानत पर छोड़ने से इंकार कर सकता है और ऐसी किसी इनकारी का, ऐसे जमानतपत्र से आबद्ध किसी व्यक्ति से धारा 446 के अधीन उसके शास्ति देने की उपेक्षा करने की न्यायलय की शक्तियों पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा।
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1 1978 के अधिनियम सं.45 की धारा 32 द्वारा अन्त:स्थापित।
2 2005 के अधिनियम सं.25 की धारा 35 द्वारा कतिपय शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित।
3 2005 के अधिनियम सं.25 की धारा 35 द्वारा अंत:स्थापित।
4 1980 के अधिनियम सं.63 की धारा 4 द्वारा अन्त:स्थापित।

Chapter XXXIII - CrPC 436 in Hindi - In what cases bail to be taken.

(1) When any person other than a person accused of a non - bailable offence is arrested or detained without warrant by an officer in charge of a police station, or appears or is brought before a Court, and is prepared at any time while in the custody of such officer or at any stage of the proceeding before such Court to give bail, such person shall be released on bail:
Provided that such officer or Court, if he or it thinks fit, 1[may, and shall, if such person is indigent and is unable to furnish surety, instead of taking bail] from such person, discharge him on his executing a bond without sureties for his appearance as hereinafter provided.
2[Explanation.— Where a person is unable to give bail within a week of the date of his arrest, it shall be a sufficient ground for the officer or the Court to presume that he is an indigent person for the purposes of this proviso:]
Provided further that nothing in this section shall be deemed to affect the provisions of sub-section(3) of section 116 3[or section 446A].

(2) Notwithstanding anything contained in sub-section(1), where a person has failed to comply with the conditions of the bail - bond as regards the time and place of attendance, the Court may refuse to release him on bail, when on a subsequent occasion in the same case he appears before the Court or is brought in custody and any such refusal shall be without prejudice to the powers of the Court to call upon any person bound by such bond to pay the penalty thereof under section 446.
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1. Subs. by Act 25 of 2005, s. 35, for certain words (w.e.f. 23-6-2006).
2. Ins. by s. 35, ibid. (w.e.f. 23-6-2006).
3. Ins. by Act 63 of 1980, s. 4 (w.e.f. 23-9-1980).
4. Ins. by Act 25 of 2005, s. 36 (w.e.f. 23-6-2006).


"जमानत आरोपी का परम व अलोप्य अधिकार है" - ऐसा माननीय सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति आर.वी. रवींद्रन और न्यायमूर्ति जे.एम. पांचाल की खंडपीठ ने सन 2009 में श्री रसिक लाल द्वारा दायर एक अपील की सुनवाई के बाद अपने निर्णय में कहा कि जैसे ही जमानती धाराओं में गिरफ्तार व्यक्ति जमानत की शर्तो को पूरा करने के लिए तैयार हो जाता है, उसे जमानत पर रिहा कर दिया जाना चाहिए। ऐसे मामले में जमानत पर रिहा होना आरोपी का अधिकार है। पुलिस अधिकारी या अदालत द्वारा तय की गई जमानत शर्तो को पूरा करने या बांड भरने के बाद उसे रिहा किया जाना चाहिए। उच्चतम न्यायलय ने दण्ड प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 436 का उल्लेख करते हुए कहा की इस धारा में स्पष्ट है कि जमानती धाराओं में आरोपी को जमानत का पूरा अधिकार है। इसमें पुलिस अधिकारी या अदालत की राय का कोई महत्व नहीं है। अगर आरोपी जमानत की शर्तो को पूरा करता है, जमानत की शर्तो को पूरा करने में धोखाधड़ी नहीं करता है या रिहाई के बाद उसका व्यवहार निष्पक्ष सुनवाई को प्रभावित नहीं करता है तो उसे जमानत पर रिहा किया जा सकता है।
JUDGMENT
बलात्कार एक घृणित अपराध
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